श्रेया

सच्चे और जूनून भरे प्रेम में प्रेमी, प्रेमिकाओं को कभी दूर नहीं जाने देते.

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मुझे पता है मेरे आने वाली जिंदगी उसकी तलाश में हीं बीतने वाली है. किसी का अचानक से गायब हो जाना कितना गलत और अजीब हो सकता है ये अभी कोई मुझसे बेहतर नहीं महसूस कर सकता होगा. आज भी कोई ऐसा एक पल नहीं बीतता जब मैं उसकी तलाश में नहीं होता हूँ. मेरे सारे दोस्त, मुझे जानने वाले सभी लोगों को पता है की मैं उसके बिना कितना अधूरा और अकेला हूँ. मेरी जिंदगी में जितने लोग थें अब वो सब धीरे-धीरे गायब हो गए है. मैं रोज सुबह उठता हूँ खाना बनाता हूँ खाता हूँ दफ्तर होता हूँ शाम को घर लौटने से पहले एक बार उसकी तलाश में घंटो बाहर भटकता हूँ और फिर वापिस आ जाता हूँ. मेरा जीवन बस यही तक सीमित हो गया है. कल भी मैं पुलिस स्टेशन में घंटो इसलिए बैठा रहा की शायद उसका कोई पता मिल जाए. कोई सुराग मिल जाए. पुलिसवालों की बातों पर मुझे यकीन नहीं होता की श्रेया इतने दिनों से नहीं मिली तो शायद मर गयी होगी. मैं इस चीज को आसानी से नहीं मान सकता. मुझे पता है वो ज़िंदा होगी. इसी दुनिया में कहीं किसी कमरे में बैठी मेरे बारे में सोच रही होगी. हाँ. मुझे इस बात का पूरा यकीन है. वो मेरे बारे में ही सोच रही होगी.

श्रेया से पहली बार जब मिला था पहली दफा हीं मुझे इस बात का अंदाजा लग गया था की ये वही लड़की है जो मेरे लिए बनी है. कभी कभी हम चीजों को इतना करीब से चुम लेते हैं की उनके न होने की कल्पना नहीं कर सकते. श्रेया के साथ भी ऐसा ही हुआ. एक दिन उसने कह दिया की अब वो मेरे साथ नहीं रहना चाहती उसे कोई और पसंद है. मैं ये बात सुनकर बहुत टूट गया था. मैंने मनाने की बहुत सी कोशिशें की पर वो नहीं मानी. और फिर एक दिन गायब हो गयी. ऐसी गायब जैसे वो इस दुनिया में एग्जिस्ट हीं नहीं करती थी. उसके दोस्त, उसके घरवाले सबने उसे ढूंढा पर वो नहीं मिली. अब तो शायद उसके घरवालों ने उसे मरा हुआ ही मान लिया है लेकिन मुझे अब भी इस बात का अंदाजा है की वो ज़िंदा है. और उसे ज़िंदा रहना ही होगा.

आज उसको गायब हुए ५ साल हो गए हैं. उसका जन्मदिन भी है आज. आज मैंने सुबह नाश्ते में उसकी पसंद का नाश्ता बनाया था. लंच में भी मैं अभी उसके लिए चिकन करी बना रहा. उसे मेरे हाथ से बनी चिकन करी बहुत पसंद है. ज़िंदा रहने के लिए खाना तो जरुरी है न? हैं न जरुरी? बिल्कुल जरुरी है. मुझे लगता है की चिकन करी तैयार हो गयी है. मुझे शायद अब नीचे जाना चाहिए. मेरे घर के नीचे एक तहखाना है. सुन्दर सा तहखाना. जिसमें एक प्यारा सा कमरा है. उस कमरे में सबकुछ है बस उस कमरे से बाहर जाने की आजादी नहीं है. आपको पता है पिछले ५ साल से इस कमरे में एक लड़की कैद है. नहीं नहीं कैद कहना सही नहीं होगा. क्यूंकि कैद में तो मैं हूँ. श्रेया की कैद में. इतने सालों बाद भी मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर पाया हूँ की प्रेम कभी कभी उलटे ढंग से धीरे-धीरे खत्म हो जाता है. श्रेया का भी मेरे लिए प्यार अचानक से खत्म हो गया जो नहीं होना था. मुझे भी इंसान ही बना रहना था लेकिन ये भी नहीं हो पाया. खैर ये बातें कभी और. मुझे इस कमरे में जाना चाहिए.

“हायश्रेया… हैप्पी बर्थडे. देखो मैंने आज तुम्हारे लिए क्या बनाया है. चिकन करी”

आपलोगों को पता दुनिया की सबसे कुटिल मुस्कान का घर कहाँ है? मेरे होठों पर. और दुनिया की सबसे बड़ी बेबसी और लाचारी कहाँ है पता है? श्रेया के मुरझाये चेहरे पर.

सच्चे और जूनून भरे प्रेम में प्रेमी, प्रेमिकाओं को कभी दूर नहीं जाने देते.

नोट: ये कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है. इसका किसी के जीवन से कोई लेना देना नहीं है.

परछाइयाँ

कौन कहता है मौत के बाद परछाइयां नहीं दिखती।

“कुछ देर पहले तक वो यहीं था। बालकनी में बैठ कर सिगरेट पी रहा था। मैं भी उसके साथ ही था। पता नहीं अचानक से कहाँ चला गया। मुझे उसकी तलाश करनी चाहिए।”

इतना सोचकर वो उस इमारत से किसी साये की तरह उतरकर सड़क पर चला आया। रात के 11 बज रहे थे। शहर में अब भी मेट्रो आखिरी मेट्रो अपने-अपने सवारियों की तलाश में लोहे की पटरियों को चूम रही थी। वो जानता था की उसे जिसकी तलाश है वो अभी भी किसी मेट्रो की सीट पर बैठा कोई किताब पढ़ रहा होगा या मेट्रो में आने वाले लोगों की भीड़ में कोई चेहरा तलाश रहा होगा। वो इस शख्स के साथ हमेशा उसकी तलाश और तड़प का हिस्सा रहा है।

रात के उस पहर में शहर के ज्यादातर लोगों की दौड़ उनके बिस्तरों पर जाकर खत्म हो गई थी। लेकिन अब भी ऐसे लोग थे जो अपने-अपने ठिकानों पर नहीं पहुंचे थे। कुछ मेट्रो की सीट ऊंघ रहे थे तो कुछ अपनी प्रेमिकाओं को अपने सीने में दुनिया से छिपाकर रखते हुए अनजान बनने की नाकाम कोशिशों में लगे हुए थे।

वो मेट्रो के एक कोच से दूसरे कोच की तरफ बेतहाशा किसी को ढूंढ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उस से उसके शरीर का कोई हिस्सा खो गया हो। वहां मौजूद और लोग उसकी उपस्थिति से अनजान थे। लेकिन वो सबके चेहरे देख पा रहा था। बहुत तलाश करने के बाद वो मेट्रो की दीवार पर आकर चिपक गया।

“इंसान लापता क्यों होते होंगे। किसी का चले जाना मौत से भयानक क्यों होता है। मेरी किस्मत भी कितनी अजीब है। मैं तो मर भी नहीं सकता। वो जबतक इस दुनिया में मौजूद है मैं जिंदा ही रहूंगा। वो भी तो उस लड़की के लिए ऐसा ही सोचता था। दोनों अपने प्यार में अघाते नहीं फूलते थे। उसकी वजह से हीं मेरे दिल में भी किसी के लिए प्यार के बीज फूटे थे। वो जब उस लडक़ी को चूमता था तब मैं भी एक लड़की को चूम लेता था। मेरे सीने में दिल न होते हुए भी मुझे लगता था की मेरे अंदर मांस का एक लोथड़ा पहली बार अपने महबूब से मिल रही किसी लड़की के कांपते होठों सा धड़क रहा था। उस लड़की के जाने से मेरी भी मुहब्बत मुझसे दूर हो गई। और वो तो पागल ही हो गया। अभी हाल में ही तो उसने एक अनजान लडक़ी को इसलिए थप्पड़ मार दिया था क्योंकि वो किसी लड़के से कह रही थी “मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी”। मैं जानता हूँ वो पागल नहीं है। लेकिन अब कभी कभी हो जाता है। लड़की को थप्पड़ मारने के बाद उसे लोगो ने खूब पीटा था। मैं भी पीटा था। मुझे चोट नही आई। उसे भी शायद चोट नहीं आयी होगी। इतने बुरे ढंग से पीटे जाने के बाद भी वो हंस रहा था। मैंने उसे तब भी पागल नहीं समझा था। अब भी नही समझता। परिंदा था वो। हमेशा उड़ने की सोचता था। उड़ा भी था कई बार। वो और वो लड़की दोनों रात पूनम की रात देर रात आसमान में उड़ते थे। और फिर शहर की किसी ऊंची इमारत के छत पर खड़े होकर सुस्ताते हुए एक दूसरे को चुम लेते थे।”

उसके सोच का काफिला मेट्रो में आती एक भीड़ की आवाज ने रोक दिया। उसने इधर-उधर निगाहें दौड़ाई तो देखा की सुबह हो गयी थी। दिन के उजाले ने उसके अक्स को भी हवा की तरह पारदर्शी और महीन कर दिया था। पर उस मेट्रो में उसका वजूद था। वो अपने आस पास फिर से नए चेहरों के बीच उसे ढूंढ रहा था। काल की रात बीत जाने के बाद चेहरे भी बदल गए थे। वो लोगों के बीच से चलकर मेट्रो के दरवाजे पर खड़ा हो गया।

“सुबह हो गयी। अभी तक वो नहीं मिला। कहीं वो मुझे छोड़कर कहीं दूर आसमान में उड़ तो नही रहा। नहीं, वो उस लड़की के बिना कभी आसमान में नही उड़ा। एक बार उसने उसने उड़ने की कोशिश की थी तो किसी पंख विहीन पक्षी की तरह जमीन पर गिर पड़ा था। नहीं, उसे उड़ना नही चाहिए। मुझे यकीन है वो उड़ नही रहा होगा।”

मेट्रो के हर नए स्टेशन पर पहुंचने के बाद मेट्रो में हर बार नए चहरे आते। वो अभी भी मेट्रो के दरवाजे से चिपका कांच से बाहर भागती पटरियों को देख रहा था। मेट्रो की पटरियां कितनी खाली होती है। कितना सारा खालीपन लेकर ये पटरियां लोगो को अपने मंजिल तक पहुंचाती हैं।

मेट्रो जब एक स्टेशन पर रुकी तब उसने स्टेशन के दूसरे प्लेटफार्म की पटरी पर एक कबूतर की लाश को देखा। मेट्रो की पटरियां खाली होती हैं लेकिन उनमें करंट होता है। उसने एक नजर इस मारे कबूतर पर डाली।

“ये कबूतर भी शायद किसी उड़ान में होगा। पर शायद अकेला उड़ रहा होगा इसलिए गिर गया होगा। आदमी अकेला होता है तो चाहे अंदर से कितना भी खोखला या खाली हो जाए, दिल में जमी बर्फ उसमे इतना वजन डाल देती है की कोई भी पंख उसे उड़ने नहीं देती। मैं जिसकी तलाश में हूँ वो भी शायद ऐसे ही उड़ा होगा। और ऐसे ही इस कबूतर की भांति कहीं किसी पटरी पर या किसी के आंगन में गिर गया होगा। वो शायद अपने घर के आंगन में ही गिरा होगा जहां उसकी मां अब भी अपनी बूढ़ी आंखों से चावल से कंकड़ निकाल रही होगी। अगर वो सच में कहीं गिर गया है तो अब मैं किसकी तलाश करूँ। मेरा तो वजूद ही उस से हैं। परछाइयां साथ छोड़ती हैं पर उसने अपनी परछाईं को ही छोड़ दिया। अब मैं कहाँ जाऊंगा। अब मुझे उस लड़की की परछाई भी नही मिलेगी जिसे मैं तब चूमा करता था जब वो लड़की को चूमता था।”

मेट्रो की भीड़ में किसी शख्श का भटका हुआ साया मेट्रो की एक दीवार पर चिपका तड़प रहा था। मेट्रो के दरवाजे आदतन खुल रहे थे बन्द हो रहे थे। नए चेहरे आ रहे थे जा रहे थे। मेट्रो में एक ऐसी लड़की का भी चेहरा आया जिसे वो साया जानता था।

“मुझे शायद वो न मिले पर मैं अपनी मुहब्बत को तो चुरा ही सकता हूँ। उसके साथ आसमानों में उड़ने वाली यह लड़की आन जमीन पर किसी और के साथ है। इसे पता भी नही चलेगा और मैं इसकी परछाई चुराकर दूर किसी अंधेरे शमशान में चला जाऊंगा। इसकी परछाई और मैं तब ही दिखेंगे जब शमशान में कोई चिता जलेगी। कौन कहता है मौत के बाद परछाइयां नहीं दिखतीं।”

नींद

“मैं अब बहुत थक गया हूँ, अब मैं सोना चाहता हूँ। बहुत देर तक। सो जाऊं?” उसने बीच रास्ते में ही रुककर उससे कहा
“हां ठीक है सो जाओ। मैं हूँ यहीं”। उसके बालों में सर फिराते हुए वो बोली।

वो लड़का सो गया। वो जब सोया तो लडक़ी ने उसके चेहरे को अपने दुपट्टे से ढक दिया और खुद लड़के के बाजू में बैठ गयी। साल बीत गए। लड़का सोता रहा। लड़की बैठी रही। लड़की कभी कभी सोचती कि “लड़का शायद किसी और दुनिया में अभी जग रहा है। एक जिंदगी जी रहा है।” वो ऐसा सोच के कभी कभी निराश होती और जाने की सोचती पर लड़के का व मासूम सा चेहरा देखकर उसके अंदर प्यार उमड़ जाता और वो जाने का ख्याल अपने जेहन से निकाल देती।

इस तरह एक दिन 7 साल बीत गए। लड़का नहीं उठा। लड़की को कभी लड़के के शरीर मे हरकत महसूस होती। कभी कभी लगता कि लड़का आंखें खोलनी की कोशिश कर रहा है। तुरंत उठकर उसका हाथ थामकर कहेगा चलो अब नींद पूरी हुई। पर वो नहीं उठा। लडक़ी अब झुंझला चुकी थी। इतने दिनों के इंतजार ने उसके दिल मे बस रहे लड़के के लिए प्यार को गुमशुदा कर दिया था। लड़की ने लड़के को उठाने की कोशिश की। आवाज दी। शरीर तक झिंझोड़ा। जब लड़का नहीं उठा तो उसने लड़के के सर पर एक पत्थर से मारा। लड़का फिर भी नही उठा। लड़की वहां से उठकर चल दी। जाते वक्त लड़की ने लड़के के चेहरे से अपना दुपट्टा खींच लिया। लड़के के चेहरे पर शिकन हुई। उसका चेहरा सफेद पड़ने लगा पर वो सोता रहा। लड़की चली गयी।

लड़की के जाने के बाद कई महीने बीत गया। लड़का सोता रहा अकेले। चेहरे पर बिना किसी दुपट्टे के। एक दिन उसी रास्ते पर एक लड़की आई। उसने लड़के को सोते देखा। उसे न जाने क्या याद आ गया कि उसने लड़के के चेहरे पर अपना दुपटटा ढंक दिया। चेहरे पर दुपट्टे का स्पर्श पाते ही लड़के के चेहरे में बदलाव आया। अब उसका चेहरा बहुत शांत था । ऐसा लग रहा था जैसे वो दुनिया का सबसे खूबसूरत सपना देख रहा हो।

नई लड़की भी एक बार ऐसे ही एक लड़के के इतंजार में थी जो काफी लंबे समय से सो रहा था। ये लड़की जब बीच में नही भागी थी पर एक दिन उसने देखा कि अचानक से उसके शरीर पर उसका दुपट्टा आ गया है। और उसके बगल में सो रहा लड़का गायब है। वो लड़की तब से उस लड़के को ढूंढते ढूंढते भटक रही थी और आज उसे कोई और मिल गया जो ऐसी हालत में अकेला था। लड़की को पता था कि चेहरे पर अगर प्रेमिका का दुपट्टा न हो तो प्रेमी लड़के नींद में नर्क झेलते हैं। इसलिए उसने झट से अपना दुपट्टा उसके चेहरे पर रख दिया।

कुछ महीने और बीते, कुछ साल और बीते। नई लड़की वहीं बैठी रही। वो लड़का अबतक सोता रहा। नई लड़की दुबारा किसी के इंतजार में थी। और डर भी रही थी की इस बार भी कहीं ये लड़का गायब न हो जाये। इसी से डर से उसके आंसू के कुछ कतरे लड़के के चेहरे पर गिरे।

इस दिन कई सालों बाद लड़के की आंखे खुली। आंखें खुलते ही उसने लड़की से पूछा “तुम कौन हो”?
“मैं वहीं हूँ जिसके हिस्से सिर्फ इंतजार लिखा है। वक़्त ने बस मेरा चेहरा बदल दिया है। मैं वहीं हूँ। सच्ची प्रेमिका।”
लड़का लड़की की बात सुनकर कुछ चुप रहा और फिर कुछ देर बाद लड़की को उसका दुपट्टा ओढ़ाते हुए कहा “चलो अब चलते है। थोड़ी ही दूर पे हमारा घर है।”

Photo: Clem Onojeghuo

मउगा

हम शुरू से बिहारी थे. कहने का मतलब की हमारा जन्म बिहार में हुआ था और हम दिल्ली भी गए थे मुख़र्जी नगर में कलेक्टर बनने का तैयारी करने के लिए. दू साल रहे थे उहाँ. हम न तो दिल्ली वाला बन पाए ना ही कलेक्टर. हम दुखी होकर वापिस मुजफ्फरपुर आ गए. पूरा एनसीईआरटी रट गये थे 6ठा क्लास से 12वीं तक का. निबंध भी खूब लिखते थे लेकिन प्री भी नही निकाल पाए. उधर बाबूजी पाहिले साल से मोहल्ला में हल्ला मचा दिए थे कि “मेरा जयप्रकाशवा इस बार कलेक्टर निकाल ही देगा”. बहुत उम्मीद बढ़ गया था. 26 के हो गए थे तो गाँव जवार का लोग अगुआ बन के भी आने लगा था. बाबूजी भी ताल पर ठोक कर कहते थे की “पढने में बहुत तेज है जयप्रकाशवा कलेक्टर निकाल लेगा. हम चाहते हैं की पाहिले कलेक्टर बने उस से पाहिले ही उसका बियाह करा दे, और ये हम बस अपने होने वाले समधी जी के लिए कह रहे हैं. काहे से की अगर उ अगर कलेक्टर बन गया तो मामला 1 करोड़ से कम में फरियाने वाला नही है, हाँ अभी बियाह करते हैं तो 15-20 लाख में ही फ़रिया जाएगा. बाद में तो उ कलेक्टर बनने ही वाला है. अरे कुछो नही भी हुआ तो पीओ तो जब चाहे बन ही जाएगा. मने एगो बात कह रहें हैं. वैसे भी जानते नहीं हैं क्या पीओ का कितना रेट चल रहा है. और हमरा बेटवा हेंड्सम भी कम नही है. ई निरहुआ और खेसारीलाल का तो बात ही नही है ऋषि कपूरवा के बेटवा जैसा दिखता है जयप्रकशवा”

वैसे हम भी कम नहीं फेंकते थे लेकिन बाबूजी हमसे भी दू हाथ आगे फेकने लगे थे और उनके फेंकाई के चक्कर में हमपे बर्डन बढ़ता जा रहा था. घरे बाबूजी हमको दिल्ली भेजते ही कलेक्टर बना बैठे थे और यहाँ सच्चाई ऐसा था की हमको कुछ समझ ही नही आता था. पढ़ाई में मन भी नहीं लगता था.

हम जैसे तैसे 2 साल दिल्ली रह के देख लिए थे. कलेक्टर बनना तो दूर प्री भी एक बार नहीं निकला. हम भी एक दिन बाबुजी से कह दिए की “हम अब वापिस आ रहे हैं. नहीं हो पा रहा है हमसे कलेक्टर बलेक्ट्र का तैयारी. हम गांवे जाके खेत खलिहान संभाल लेंगे. फेंकाई बंद कीजिये आप. हम काल्हु सप्तक्रांति पकड़ के आ रहे हैं.” हम ऐसा कह के सोचे थे की बाबूजी मान जायेंगे और घरे बुला लेंगे पर हमारे बाप भी कम ढीठ नही थे. उनका कहना था “कलेक्टर नही बने तो ठीक है, इतना छुट देते हैं लेकिन अगर कौनो सरकारी नौकरी नहीं लगा तो हम तुम्हारे यहाँ आने से पहले जहर खा के मर जायेंगे. तुम्हारी माई को भी खिला देंगे और तुम्हारी बहिन को भी. पूरा परिवार खत्म कर देंगे जान लो.”

हमको समझ में नही आया की बाबूजी ये अपने फेंकी गयी बातों की इज्जत बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं या फिर सचमच हमको कलेक्टर बनाना चाहते हैं. आनन फानन में हम भी बाबूजी को रोते हुए कह दिए “बाबूजी हम सरकारी नौकरी ही करेंगे. अगिला बार से मरने वाला बात नहीं कीजियेगा. कलेक्टर नही बनेंगे तो क्या हुआ बीडीओ, दरोगा बन के दिखाएँगे. ये भी नही बने तो स्टेट बैंक में क्लर्क तो बन ही जायेंगे.”

वैसे बीडीओ- दरोगा तक तो सही था. बाबूजी खुश भी हो गए थे. हल्ला भी कर दिए थे की “बेटा दरोगा बनेगा. सब फाइनल हो गया है. बस नौकरी पे जुआइन कर ले तुरंते बियाह कर देंगे” दिक्कत बस ये थी की हमसे न दरोगा निकला ना ही बीडीओ बन पाए. हाँ लेकिन जब घर लौटे तो बाबूजी को बताये की “बाबूजी बाकी सब छोडिये स्टेट बैंक में क्लर्क निकाल दिए हैं. समस्तीपुर पोस्टिंग पड़ा है. अब बियाह कराइए.”

कलेक्टर, बीडीओ, दरोगा न सही सरकारी बैंक में क्लर्क ही सही. पिताजी सबकुछ भूलकर नए सिरे से खुश थे. मेरी शादी भी तय हो गयी थी. वैसे हम अपनी शादी के लिए पिताजी को मना किये थे. हम सोच रहे थे पहले अपनी बहन कंचन का बियाह हो जाए. लेकिन बाबूजी परम ज्ञान देते हुए हमको समझाए की “अरे पहले तुम्हारे बियहवा में लेंगे तभी तो कंचंनवा में खरीचा करेंगे. क्लर्क का भी कोई कम रेट नही है. 25-30 से कम तो बोलेंगे ही नहीं. घर द्वार खेत खलिहान भी तो है. सामने वाला नही भी देगा तो 20 तक दे ही देगा. इसी में कंचंनवा का भी बियाह फ़रिया लेंगे.

हमको वैसे पता चल गया था की बाबूजी बिना मोटा माल लिए हमरा बियाह नही होने देंगे. वैसे भी हमलोग का सब बाबूजी ही फाइनल करते हैं. हाँ हमलोह पियार मुहब्बर भी करते हैं पर बस खाने पीने तक. सुमेध्वा के साथ बाबूजी एक बार पकड़ लिए थे सीढ़ी वाले रूम में. कुछ नही बोले थे. बस इतना कहे थे की जो किये सो किये बाकी बियाह राजपूत में ही होगा. उम्र हैं शौक है लेकिन बियाह नहीं होने देंगे इस से. हमलोग में भूमिहार ब्राह्मण से भी नही चलता है. वैसे हम सुमेध्वा को समझाए थे की हम कलेक्टर बनते ही बागी बन जायेंगे और बियाह कर लेंगे पर दिक्कत ये हुआ की हम कलेक्टर नही बन पाए. हम भी थोड़े कमजोर ही थे इसलिए जब बाबूजी कहें की बियाह फिक्स कर दिए हैं 15 लाख तिलक पर तो हम कुछ नही बोले. सच कहें तो अन्दर ही अन्दर हम खुश थे. काहे से की जो लड़की का फोटो हमको आया था वो बहुत ही खूबसूरत था. पढ़ी लिखी भी थी. पढ़ाई लिखाई भी की थी तो दिल्ली विश्वविद्यालय से. हम जब दिल्ली में थे तब खूब ट्राई मारे थे डीयु वाली लड़की सब पे. कौनो भाव नही दी थी. और साला ऐसा दिन भी आया की हमरा बियाह ही हो रहा था डीयु वाली लड़की से.

सबकुछ एकदम सेट था, सब बढ़िया था. बियाह भी हो गया. 15 लाख तिलक भी मिला. आनन-फानन में एगो सिपाही लड्किका देख के कंचंनवा का बियाह 10 लाख तिलक में सेट हो गया था. हम बहुते खुश थे. बाबूजी भी बहुते खुश थे. और जो हमारी मिसेज थी वो थोड़ी बागी टाइप की थी लेकिन हमारे परिवार में आकर ढल गयीं थी.

दिक्कत वहां से शुरू हुआ जब कंचन के ससुराल वाले शादी से 2 दिन पहले कहने लगे की ‘ नहीं आप अपने बेटवा का तिलक 15 लाख लिए हैं. हमारा बेटा भी सिपाही बहाल हुआ है. दरोगा रिटायर करेगा. जोन थाना में है वहां उपरी आमदनी भी कचक के है. तिलक तो दस लाख ही चाहिए पर एगो स्कॉर्पियो भी चाहिए अब. इस बात को सुनकर सबसे ज्यादा नींद मेरी उड़ी थी. पिताजी एकबारगी परेशान हुए फिर बाद में हमको अपने कमरे में बुलाकर कहें” सुनो, स्कॉर्पियो मांग रहा है तो दे दो. का दिक्कत है. बहुरिया घरे आ ही गयी है. उनके बाबूजी से कहो स्कॉर्पियो दिला दे. केतना का आता होगा 10-12 लाख में मामला फ़रिया जाएगा.”

वैसे हम दहेज़ के खिलाफ थे. मतलब जो मिल गया वो ठीक है. लेकिन एक्स्ट्रा डिमांड करना मेरे लिए सही नही था. हालांकि एक दिन हम छुट्टी के दिन अपनी मिसेज को एक बनारसी साडी गिफ्ट करते हुए बोल ही दिए ” अरे. कंचंनवा के ससुराल वाले स्कॉर्पियो मांग रहें. अब तुम सब जानती ही हो. पाहिले ही हम दोनों के बियाह में बाबूजी कितना खर्चा कर दिए हैं अब स्कॉर्पियो हमलोग नही सकते. तुम अपने बाबूजी से कह के हमको एगो स्कॉर्पियो दिला दो न. देखो अब तुम भी इस परिवार की सदस्य हो. तुमको भी तो इनिशिएटिव लेना होगा न. इसी में कंचंवा का भी भविष्य सुधर जाएगा”

उस दिन अपने हिसाब से मैंने बहुत सही बात थी लेकिन मुझे पता नही था की मेरी मिसेज दिल्ली युनिवेर्सिटी की पढ़ी लिखी है. उसने साफ़ मना कर दिया. उसने कहा “इ सबसे पहले 1 रुपये का दहेज़ भी गलत है. वो इसलिए ही चुप है क्योंकि वो अपने पापा के खिलाफ नहीं जा सकती लेकिन अब वो 1 रुपये भी दहेज़ नही देगी.” उसने तो यहाँ तक कह दिया की उस सिपाही से कंचन की शादी करानी ही नहीं चाहिए.

हम जब अपनी मिसेज के पास गए थे तो हमको लगा था की स्कॉर्पियो मिल जाएगा. पर नहीं मिला. वैसे हम अपनी मिसेज की बात से भी सहमत थे. अच्छा ही बोल रही थी. हमको उसकी बात काटने का हिम्मत नही हुआ. हम वैसे भी किसी की बात नही काटते थे. हम अपने बाप का भी बात में हां में हाँ मिलाते थे, माँ के भी बात में हाँ में हाँ मिलाते थे. कंचनवा भी जो कहती थी उसमें भी हाँ में हाँ मिलाते थे. कनचनवा को एक बार हम मंदिर के पीछे एगो लड़िका से बतियाते हुए पकडे थे. कंचनवा बोली की : नहीं हम इसने प्यार करते हैं, इन्हीं से शादी करेंगे” हम कंचनवा की बात का कुछ जवाब देते की इस से पहले ही उसके साथ खड़ा लड़का बोला “साले साहब यहाँ से भागिएगा की अब दागे कट्टा आपके देहियाँ में” उस दिन हमको लगा की कंचन भी सही ही बोली. मेरा एगो आदत था की हम बहुत ही जल्दी किसी से इन्फ्लुएंस हो जाते थे. इसलिये मोहल्ला में सब हमको मौगा या मेहरा बोलता था.

हम बाबूजी से उस दिन साफ़-साफ़ कह दिए थे की नेहा अब कुछ भी नही देगी. आप कंचनवा का बियाह कैंसिल कर दीजिये. कोई अच्छा लड़का ढूंढ लीजिये. हम बाबूजी का बहुत इज्जत करते थे पर बाबूजी ने उस दिन जो जवाब दिया उसकी वजह से हम बाबूजी से नफरत करने लगे. बाबूजी उ दिन हमको कहें ” कंचंनवा का बियाह रत्नेश जी से कैंसिल कर दें और तुम्हारे जैसे कौनो मौगा लड़का से सेट कर दें. रे तुमको कितना दिन हुआ रे बियाह किये. तुम साला अभिये से मेहरारू के लुग्गा में घुस गया है रे.”

हमको उस दिन बुझा गया था की बाबूजी मानने से नहीं. हम अगला दिन दलसिंह सराय वाला बस पकड़ के समस्तीपूर की तरफ चल दिए. हमको लगा था की सब ठीक हो जाएगा. पर वैसा कुछ हुआ नहीं. हम उस दिन ऑफिस में थे की माई का फोन आया कि “बेटा जल्दी घरे आ जाओ, पतोहिया आग लगा ली है.” हम एकदम आनन फानन में मुजफ्फरपुर का बस पकड़ें और घरे आ गएँ. घरे आयें तो पता चला की नेहा तो जल के मरी ही हैं साथ में कंचनवा भी जहर खा के मर गयी है. हमको 2 मिनट नहीं लगा सारा मामला समझने में. हमको उस समय मन किया किया की बाबूजी को एक हाथ लगायें पर हम शायद सच में मौगा थे. कुछ नही कर पाए. बाबूजी कंचन का नाम लेकर दहाड़े मारकर रो रहे थे. नेहा का नाम उनके मुख से एकबार नहीं निकला.

पुलिस घर पर आई थी. मामला पूरा देहज का था लेकिन बाबूजी के पैसों ने पुलिस फाइल में इस घटना को आत्मह्त्या का मामला कहकर रफा दफा कर दिया. मुझे सबकुछ पता था. मैंने किसी से कुछ नही कहा था. मैंने समस्तीपुर में ही एक कमरा लेकर रहना शुरू कर दिया था.

एकदिन माँ ने उसी की तरह दिन घबराते हुए आवाज में मुझे फोन किया “बेटा. घर आ जा, तुमरे बाबूजी मरने के कगार पर हैं. बाप का मामला था हम तुरंत बस पकड़ के घर आ गए. मेरे आने के कुछ देर बाद से बाबूजी की तबियत सुधर गयी. हम बाबूजी से कुछ नही कहे और सीधे घर के सामने वाले आंगन में पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. मूड बहुत खराब था इसलिए गाँव के एगो लईका से बोले दारु मंगाकर पी रहे थे. उस समय बहुत दुखी थे. तभी अचानक से बाबूजी के चिल्लाने का आवाज आया. सामने जब देखे थे तो आँखों पर विश्वास नहीं आया. सामने पच्चीसों से भी ज्यादा स्कॉर्पियो खड़ा था. इन्हीं स्कार्पियों में से एक के आगे बाबूजी दबे पड़े थे. वो दर्द से बिलबिला रहे थे. उस दिन पता नही ऐसा क्या हुआ की बाबूजी के इस हालत को देखकर भी मैं कुर्सी से उठकर खड़ा नही हुआ. वहीँ बैठ कर शराब पीता रहा. बाबूजी मरे नही बस चिल्लाते रहे. मैं वहीँ बैठा रहा. तभी अचानक से सामने खड़ी एक स्कॉर्पियो से नेहा निकल कर आई और उसने चिल्लाते हुए कहा “का रे मौगा, बाबू(बाप) को बचाएगा नहीं का रे, साफे चूड़ी पहिन लिया है क्या” उसने इतना कहने के बाद मैंने सामने खड़ी सभी स्कॉर्पियो की छत पर कंचन को बैठे देखे. वो सारी कंचने मुझे ऊँगली दिखाकर खिलखिला कर हंस रहीं थी.

धूल

मुझे पहले नहीं पता था की मरने के बाद लोग कहाँ जाते हैं. मुझे पहले लगता था की लोग या तो स्वर्ग जाते होंगे या नरक जाते होंगे या फिर कुछ लोग यहीं धरती पर ही रह जाते होंगे. मुझे इस सवाल का जवाब तब मिला जब आखिर में मुझे मृत्यु ने चूम लिया. मैं ऐसे अमूमन कई दफा अपनी बाइक से गिरता हूँ पर उस दिन जब मैं रात के बारह बजे शीतल के घर जा रहा था तो अचानक से सामने एक कार आ गयी और मैं कार से बचने के चक्कर में बाइक से गिर गया और मर गया.

वैसे मैं इस से पहले की आगे की बात बताऊँ, मैं आपलोग को बताना चाहूँगा की मैं शीतल से इसलिए मिलने जा रहा था क्यूंकि शीतल मेरी गर्लफ्रेंड थी. उस से मेरा दो महीने पहले ब्रेक अप हो चुका था. मैं शीतल को बहुत पहले मना लेना चाहता था पर मैं अपने होश वाली जिंदगी में बहुत नीरस आदमी हूँ. मुझे कभी नहीं लगा की मुझे शीतल से ब्रेकअप के बाद बात भी करनी चाहिए. पर उस दिन मेरे ड्राईवर ने ये कहकर की उसका जन्मदिन है थोड़ी सी शराब पिला दी. शराब पीने के बाद मुझे अहसास हुआ की शीतल से ज्यादा मुझे कोई भी लड़की प्यार नहीं कर सकती. इसलिए मैं अपने ड्राईवर की बाइक लेकर शीतल से मिलने जा रहा था.

हाँ, ये सच है की कभी कभी शीतल मुझसे बहुत ही बुरा व्यवहार करती थी पर मुझे लगता है की बस शीतल ही मुझे प्यार करती है. शीतल वैसे बहुत गोरी और सुन्दर है. बहुत लड़के उसके दीवाने हैं. मेरा एक दोस्त खुद शीतल का दीवाना है. लेकिन शीतल ने सिर्फ मुझे पसंद किया है. इसलिए नहीं की मैं एक बड़ी कंपनी में मैनेजर हूँ. इसलिए की शीतल मेरे अन्दर के इंसान को पहचानती है. अगर शीतल मेरी अच्छाई को नहीं देखती तो वो मेरे दोस्त अमर की प्रेमिका होती. अमर तो उसके बचपन का दोस्त भी है. दोनों एकदुसरे को जानते भी हैं लेकिन अमर एक नंबर का कामचोर है.वो मेहनत नहीं करता. वो हमारे क्लास में साथ पढता था लेकिन वो कभी खुद को इस काबिल नहीं बना सका की उसको कोई भी नौकरी मिल सके. वो अब भी अपने मोहल्ले में इधर उधर रंगदारी कर के अपना गुजारा करता है. शायद इसलिए शीतल उसको पसंद नहीं करती.

खैर मुझे जो बातें कहनी थी वो मैं कह चुका. मैं बस ये बताना चाहता हूँ की हर कोई मरने के बाद स्वर्ग में या नरकं में नहीं जाता या फिर वो कोई प्रेत बनके धरती पर ही नहीं भटकता. मरने के बाद लोगों को कई और तरीकों से भी इस्तेमाल किया जाता है. अब मुझे ही ले लीजिये. मरने के कुछ ही देर बाद मुझे कुछ आदमियों ने कहा की तुम्हें सेक्शन 4 में जाना हैं. मैं सेक्शन 4 का पता पूछते-पूछते वहां पहुँच भी गया. वहां मुझे दो अजीब शक्ल वाले आदमियों ने एक श्रेडर में डाल दिया. मैं जब उस श्रेडर से बाहर निकला तब एक धूल की परत बन चूका था. हालाँकि तब भी मुझे इतना होश था की मैं ये सुन सकूँ की मुझे श्रेडर में डालने वाले लोगों ने आपस में क्या बात की

“अरे इसे कहीं धूल बनाकर ट्रान्सफर कर दो, ऐसे भी ये कोई उतना सही आदमी नहीं है. इसकी बीवी इस से बहुत प्यार करती थी. पर इस साले को कोई और पसंद थी. इस साले ने किसी और लड़की की खातिर अपनी बीवी को शादी के ही दिन मार दिया था. उसके बाद वो उसी लड़की से सच्चा प्यार करने लगा. होना क्या था वो लड़की भी किसी और से प्यार करती थी. जबतक उस लड़की को इस लड़के को आजमाना था उसने आजमाया. फिर छोड़ दिया. ये साला उस से नशे में मिलने ही जा रहा था की उसी लड़की के यार के कार से टक्कर खा के मर गया.”

कल दिवाली है. शीतल और अमर अपने घर की सफाई कर रहें हैं. शीतल के हाथ में एक कपडे का टुकडा है और वो एक सीढ़ी वाले स्टूल पर खड़ी है. नीचे अमर ने इस सीढ़ी वाले स्टूल को पकड़ के रखा है. अमर बार बार शीतल को गिराने की कोशिश कर रहा है पर गिरा नहीं रहा. शीतल अमर की इस शरारत को महसूस करके खूब इतरा रही है और मुस्कुरा रही है. शीतल अब अपने हाथ में पड़े कपडे से पंखें के ऊपर की जमी धुल को साफ़ कर रही है. ये कोई आम धुल नहीं है. ये मैं ही हूँ. मरने के बाद मुझे नरक और स्वर्ग में जगह नही मिली तो बस मुझे धूल बना दिया गया.

पेन्सिल

लम्बी कहानी/पेन्सिल
 
उस दिन ऑफिस में पहला दिन था. महीनों बेरोजगार रहने के बाद मुझे एक बुक पब्लिशिंग कंपनी में एडिटर की जॉब मिली थी मैं बहुत खुश था. मेरी तनख्वाह काफी अच्छी थी. और जिस शहर में मेरी नौकरी लगी थी वो शहर इतना छोटा और सस्ता था की महीने में मैं कितना भी खर्च करूँ मेरे पैसे बचने वाले ही थे. सबकुछ अच्छा था बस ये दफ्तर बहुत पुराना था. अब भी यहाँ किताबों को एडिट करने के लिए कंप्यूटर नहीं थे. पेंसिल से ही किताबों की प्रूफरीडिंग और एडिटिंग होती थी. ऑफिस में जितने लोग थे वो सब बूढ़े थे. मेरे सिवा किसी की भी उम्र 60 से कम नही थी.
 
ऑफिस के पहले दिन जहाँ बाकी दफ्तरों में इंडक्शन जैसी औपचारिकता होती हैं यहाँ वैसा कुछ नहीं था. पहले दिन मेरे टेबल पर एक बूढ़े आदमी ने 4 किताबे, कुछ पेंसिल एक इरेज़र और एक शार्पनर रखते हुए कहा
“कोई भी दिक्कत हो आप शर्मा सर से कहेंगे. वो आपके बॉस है.”
“जी ठीक है” मैंने अनमने ढंग से जवाब दिया” और किताबें देखने लगा.
मैं जिस कमरे में बैठा था वहां मेरे बॉस के अलावा 3 और लोग थे जो देर से आये थे. उनके आने बाद शर्मा सर ने मुझे उन सब से परिचय करवाया. रेखा झा. जनक प्रसाद और विपिन शर्मा.
 
रेखा झा और जनक प्रसाद में कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी. लेकिन विपिन शरमा का नाम और उसकी शक्ल देखकर मैं चौंक गया. उसका चेहरा हूँ ब हूँ मेरे एक बचपन के दोस्त के साथ मिलता था. अगर मेरा वो बचपन का दोस्त 60 साल का होता तो ठीक वैसा ही दिखता. सांवली सी सुरत. सफ़ेद स्लेटी बाल. थोड़ा झुका हुआ शरीर. चेहरे पर झुर्रियो की महीन रेखाएं. मुझे उस से मिलकर थोड़ा अजीब लगा क्यूंकि उसने बहुत ही अनमने ढंग से हाथ मिलाया और चेहरे पर बिना किसी तरह का भाव लाये अपने कुर्सी पर बैठ गया. उस दिन दफ्तर में न मैंने किसी से बात की न ही किसी और ने. मैं उस दिन साढ़े 5 बजते ही ऑफिस से निकल गया.
 
मेरे दफ्तर से घर तक का रास्ता तकरीबन एक घंटे का है. मैं उस दिन रास्ते भर अपने बचपन के दोस्त विपिन के बारे में सोचता रहता. मैं जितना उसके बारे में न सोचने की कोशिश करता दिमाग में उस से जुड़े दृश्य उतने ही तेजी से फिल्म की तरह चलने लगते. एक ऐसी फिल्म के दृश्य जिसमें मैं एक विलेन था.
 
वो दृश्य जो मेरी आँखों के सामने तैर रहा था उस से मैंने हमेशा भागने की कोशिश की है. उस दृश्य को अपने आँखों के कैनवास से हटाने के लिए मैंने न आने शहर बदले थे, न जाने कितने यत्न किये थे लेकिन हर बार जब भी मैं शांत होता वो दृश्य मेरे आँखों से इस तरह चिपक जाते जैसे बरसो बाद मिलने पर दो प्रेमी एक दुसरे से लिपट जाते हैं. उस दृश्य में तीसरी कक्षा में पढने वाले दो ऐसे लड़के थे जिन्हें क्लास रूम के बाहर वाले कॉरिडोर के फर्श पर स्लाइड करना पसंद था. वो उन दोनों का फेवरेट गेम था. कॉरिडोर के एक कोने से दुसरे कोने ट स्लाइड मारना. जो ज्यादा दूर स्लाइड करता वो जीत जाता था. मैं और विपिन रोजाना ऐसा करते थे. हर बार मैं ही हारा करता था. मैं बचपन से ही हर काम में औसत था. पढाई में, खेल में, कला में. मैं इतना बड़ा फैल्युर आदमी था की चापा कल से पानी निकालने आली प्रतियोगिता में भी हार जाता था. यहाँ तक लूडो के भी खेल में मैं हमेशा हारता था. मेरे अन्दर बचपन से ही एक लूजर ने जन्म ले लिया था, जिसे केवल हारना आता था.
 
शुरुआत के दिनों में मैं हारने को एक सीख समझ कर, आगे जीतने की प्रेरणा समझकर मान लेता था लेकिन बाद के दिनों में मुझे हारना बेहद अपमानित कर देता. धीरे-धीरे मैं उस छोटी उम्र में ही दिल से बुरा आदमी बन्ने लगा था. मैंने बचपन से ही हर उस आदमी को जान से मार देने की ठान ली थी जो मुझे आगे था, जो मुझे हरा देता था. हालाँकि, एक तीसरी क्लास के बच्चे के लिए किसी को जान से मार देना ज्यादा आसान नही था लेकिन किसी को घायल कर देना बहुत हद तक मुमकिन था.
 
मेरे जिंदगी के सबसे खतरनाक दृश्य में उस दिन उन दो लड़कों के स्लाइडिंग प्रतियोगिता के खत्म हो जाने के बाद एक बहुत ही लोमहर्षक घटना घटी थी. उस दिन उन दो लड़कों में से एक लड़के ने अपने साथ के दुसरे लड़के के गर्दन में एक ताजा-ताजा शार्प की गयी पेन्सिल घुसेड दी थी. दुसरे लड़के के गर्दन से खून बह रहा था और हमला करने वाले लड़के की आँखों में खतरनाक हंसी चमक रही थी. बाद में हमलावर लड़के को पुलिस के हवाले भी कर दिया गया था लेकिन एक पुलिस बाप ने अपने बेटे को बाल सुधर गृह जाने से बचा लिया था. उस दिन की अच्छी बात ये थी की हमला करने वाला लड़का जेल नही गया, घायल होने वाला मरा नही. उस दिन की घटना के बाद बस इतना हुआ की वो दोनों लड़के दुबारा उस स्कूल नही गए. उस शहर की जमीन से वो दोनों लड़के अचानक से ऐसे गायब हो गए जैसे वो उस शहर में कभी रहे ही नही थे.
 
आज विपिन शर्मा से मिलने के बाद अचानक से वो सारे दृश्य मेरी आँखों में ज़िंदा हो गए थे. मुझे बार बार लग रहा था की ये बुढा मेरे बचपन का वही दोस्त है. हालांकि ऐसा होना बेहद नामुमकिन था. मैं अगले दिन जब ऑफिस गया तब सबकुछ वैसा ही था जैसे कल था. मैं अपने डेस्क पर बैठा एक किताब एडिट कर रहा था. बाकी लोगो की तरह विपिन भी अपने सक पर बैठ के अपना काम कर रहा था. वो दिन बेहद सामान्य सा था लेकिन न जाने मुझे ऐसा लग रहा था की आज कुछ बेहद अजीब होने वाला है.
 
उस दिन जब मैं लंच के बाद अपने डेस्क पर बैठने जा रहा था तभी विपिन शर्मा ने मुझे स्टेशनरी रूम में साथ चलने का इशारा किया. मुझे उस दिन लगा शायद शायद उसे मुझसे कोई काम हो इसलिए मैं उसके कहने पर उसके साथ स्टोर रूम चला गया.
 
“मुझे एक पेन्सिल चाहिए थी. यहाँ पर पड़ी सभी पेंसिलें खत्म हो चुकी हैं” वो कमरे की एक कुर्सी पर बैठते हुए बोला
“आप मुझे मेरे डेस्क पे ही बोल देते मैं वहीँ आपको पेन्सिल दे देता. मेरे पास कई पेंसिलें हैं.” मैंने अपनी खीज को दबाते हुए बड़े ही विनम्र शब्दों में कहा
“तुम्हें पता है इस दुनिया की सारी पेंसिलें खो चुकी हैं”
“आप ये कह रहे हैं. अगर सब पेंसिलें खत्म ही हो गयी हैं तो मैं आपको कहाँ से पेन्सिल दे दूं. आप मतलब ठीक तो है न. 60 वर्ष में आदमी सठियाना शुरू करता है, एकाएक पागल नही हो जाता” मैंने थोड़े कड़ी आवाज में उसे कहा और वहां से जाने के लिए कुर्सी से उठा.
वो कुछ सेकंड बैठा रहा और फिर अचानक से मेरा हाथ अपनी गर्दन की अरफ ले जाते हुए बोला “यहाँ हैं एक पेन्सिल. कई सालों से पड़ी है. बहुत दर्द देती है ये पेन्सिल. अगर तुम चाहो तो मुझे इस दर्द से आजाद कर सकते हो. मैं उस दिन उन पेंसिलों के जख्म की वजह से असमय ही बुढा हो गया. मेरे हाथ पैर कांपते हैं. मेरी यादाश्त ठीक नहीं रहती. मैं हमेसा एक गहरे दर्द में जीता हूँ. निकाल दो ये पेन्सिल”
उस दिन उसकी वो बात सुनकर मैं कुछ देर के लिए पत्थर का हो गया. अचानक से मेरे आस पास की चीजें ठंडी और काली होती नजर आने लगी. मुझे अचानक से एक बच्चे की रोने की तेज आवाज आने लगी. उस असहनीय स्थिति में अचानक से मैंने उसके गर्दन से वो पेन्सिल निकाल दी. सबकुछ अचानक से पहले की तरह हो गया. आदमी के काँधे से अगर कोई दोष हैट जाए तो शरीर बहुत हल्का महसूस करता है. उस दिन मुझे सालों बाद हल्का-हल्का महसूस हुआ. मैं इतना अलका महसूस कर रहा था की मेरी आँखें एक नम हो चुकी थी.
 
मैं उस दिन स्टेशनरी रूम से सीधा वाशरूम की तरफ गया. मैंने पानी की कुछ छीटें अपनी आँखों पर मारी और आईने को देखर पहले मुस्कुराया, हंसा और चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगा.
 
उस दिन मेरी उम्र अचानक से 60 साल हो गयी और मेरे मैंने अपने गर्दन के अन्दर एक पेन्सिल को धंसा पाया.
 

शालिनी

मैं पिछले अठारह साल से कहाँ था इसकी कहानी इस अठारह साल की लड़की से शुरू होती है जो अभी मेरे सामने एक बिस्तर पर एक 20 साल के लड़के के साथ बेसुध सोयी है. मुझे नहीं पता की प्रेम देह पर जाकर खत्म होता है या फिर देहों के सड़ जाने पर होता है. पर मुझे अपने अनुभव से इतना जरुर पता है की मुझे पहली बार इस से तब प्यार हुआ था जब इसने मेरी पहली किताब पर औटोग्राफ लेते हुए मुझसे कहा था “ये बहुत ही घटिया उपन्यास है” मुझे इसके जवाब पर मन ही मन थोड़ी कोफ़्त तो हुई थी पर मैंने मुस्कुराते हुए उस से पूछा “अगर किताब इतनी ही घटिया है तो ऑटोग्राफ लेने के पीछे की वजह” मेरे इस बात पर उसने चेहरे पर बिना कोई भाव लाते हुए कहा “किताब घटिया है पर लिखने वाला मुझे पसंद है”. उस दिन पता नहीं क्यों मुझे उसकी बेबाकी पर उसकी चश्मे के पीछे टिमटिमाती बड़ी-बड़ी आँखों पर या यूँ कहें उसके काले जूड़े में बंधे बालो से प्यार हो गया. किसी से प्यार होने के लिए ये दो वजहें बहुत ज्यादा हैं. इतनी ज्यादा की किसी को किसी से एक ही बार में बार-बार प्यार हो जाए. मुझे उस दिन उस लड़की से प्यार हो गया था और उस दिन मैंने उस लड़की को ऑटोग्राफ के साथ-साथ अपना दिल और अपना नंबर भी दे दिया था.

उस दिन घर आकर मैंनें कई बार अपने उपन्यास को पढ़ा. उस दिन मुझे लगा की सच में वो लड़की सच कह रही है. मैंने वाकई एक घटिया उपन्यास लिखी है. मुझे उस दिन अपने उपन्यास के लिखे हर शब्द घटिया लगे. मैं सुबह से शाम तक बस इसी बात का इन्तजार करता रहा की उसका फोन कब आएगा. इश्क में डूबे लोगों को इस बात का बहुत अच्छे से अंदाजा होगा की इंतजार की घड़ियाँ कितनी लम्बी होती है. मुझे भी उस दिन अंदाजा हुआ की आखिर सच में इतंजार करना एक लम्बी सदी को, रेत घड़ी निहारते-निहारते गुजार देना होता है. उस दिन मैंने उसके फोन का रात 12 बजे तक इन्तजार किया था फिर पता नही कब सो गया. मेरी नींद रात के ठीक 3 बजे एक गुमनाम नंबर से आये फोन की वजह से टूटी. मैंने फोन उठाया. उधर से एक बहुत खूबसूरत आवाज आई. “हेल्लो, क्या मेरी बात शुभम शर्मा से हो रही है” इतनी खूबसूरत आवाज मैंने बस कस्टमर केयर वाली लड़कियों की सुनी थी या फिर रेलवे स्टेशन पर अनाउंसमेंट करने वाली लड़कियों की. मैंने दबी आवाज में उससे कहा

“जी, आप कौन”
“अरे वाह! आज ही मिले आज ही भूल गये”
मुझे इतने देर में यह बात समझ आ गयी थी की ये उसी का फोन था. मैंने अपने अन्दर की ख़ुशी को अपने दांतों से भींचते हुए कहा “अरे आप! आपको कैसे भूल सकता हूँ. मुझे पता था की आपका फोन जरुर आएगा. वैसे अभी तक मुझे आपका नाम भी नहीं पता”
“शालिनी”
“शालिनी…. क्या”
“बस शालिनी”
“अच्छा शालिनी कहिये आपने कैसे याद किया”
“दरअसल, मैं चाहती थी की आप मेरी एक कहानी को अपने नए उपन्यास का विषय बनायें. ये काफी जरुरी है मेरे लिए और इसके लिए मैं चाहती हूँ की आप अभी मेरे पास आये मैं यहीं रेवती नगर में रहती हूँ. मैं आपको अपना पता भेजती हूँ. आप बस आ जाइए.”

उसने इतना कुछ इतना जल्दी कह दिया की मुझे कुछ समझ नहीं आया. इतनी रात को एक अनजान लड़की किसी को घर पर बुलाये ये बहुत ही अजीब है. मैंने कुछ देर सोचा और अपने अन्दर के सारे नकारात्मक विचारों को दूर कर के उससे मिलने के शहद से लिपटे आग्रह को सहर्ष स्वीकार कर लिया.

“अच्छा ठीक है. आप पता भेजिए मैं आता हूँ”


उस दिन मैं वहां नहीं होता तो शायद आज मेरे जिंदगी के 18 साल यूँ ही गायब नहीं होते. उस दिन जब मैं उसके घर पहुंचा तो उसने मुझे बहुत प्यार से बात की. उस दिन से पहले मैंने कभी किसी लड़की साथ अकेले रात के इतने पहर को शराब नहीं पी थी. उस दिन मैं ढेर सारी शराब पी ली थी. इतनी शराब पीने के बीच मेरी उस से ढेर सारी बातें भी हुई. उसकी पसंद नापसंद, कौन से लेखक उसे अच्छे लगते हैं मेरी किताब उसे क्यों पसंद नही आई, मैं उसे पसंद हूँ या नहीं.. वगैरह-वगैरह. मैं उस से बस ये न पूछ पाया की वो है कौन. रात में एक 18 साल की खूबसूरत लड़की जिसने कहा हो की आप उसे पसंद करते हैं. जिसे आप भी पसंद करने लगे हो. आपने शराब पी हो. आपने उसका हाथ थमा हो और आप उसके बहुत करीब हो. ऐसे में ये कौन पूछता है कि तुम कौन हो.

उस दिन बातों बातों में हम कब एक चादर के नीचे आ गए पता नही चला. उसका सर मेरे काँधे पर था और हम दोनों बालकनी में बैठे चाँद और तारों को निहार रहे थे. काली रात में टिमटिमाते तारे उसके जूड़े से बंधे बालों की तरह लग रहें थे. मैंने उसके जूड़े पर हाथ रखते उसे खोलने की कोशिश की पर न जाने क्यों वो किसी हिरणी की तरह चौंकते हुए सतर्क हो गयी और मेरे हाथ को अपने जूड़े से दूर कर दिया.

“क्या हुआ, मैं बस तुम्हारे बालों को छूना चाहता था”
“कुछ नही”

इतना कहने के बाद उसने मुझे कुछ और बोलने का मौक़ा नही दिया. मेरे होठ शहद जैसे स्वाद वाले शराब में डूब चुके थे. मैं उस शहद के नशे में ऐसा खोया की पता नही कब नींद के आगोश में चला गया.

उस दिन जब मेरी आँखें खुली तो मैने खुद को किसी चीज में लिपटा पाया. मेरी आँखों के सामने घना अन्धेरा था. ऐसा लग रहा था जैसे कुछ महीन रेशम के धागों ने मुझे जकड रखा हो. मैं बहुत जोर से चिल्लाया. “शालिनीईई….”
तभी मेरे बगल से किसी आदमी की आवाज आई. “आज एक और फंस गया”
“कौन हो तुम, मैं कहाँ हूँ”
उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा की मैं भी तुम्हारी तरह ही हूँ, एक आशिक. और मेरी-तुम्हारी तरह यहाँ कई लोग हैं”
मुझे धीरे-धीरे वहां और लोगों की आवाजें सुनाई दी.
“हम हैं कहाँ”
“शालिनी के जूड़े में”


आज अठारह साल के बाद मेरे सामने लेटी इस लड़की के बगल में सोये लड़के ने इस लडकी के जूड़े खोल दिए हैं. शायद शालिनी सो गयी होगी या फिर उसे इस लड़के से प्यार हो गया होगा जो उसने इसके जूड़े को खोला होगा. मैं अभी 40 साल का हूँ मेरे साथ और भी लोग जो मेरे ही उम्र के आस पास के उम्र के होंगे. ये मेरे साथ खड़ें हैं. आज हम शालिनी को उसके प्यार का तोहफा देंगे. अब शालिनी दुबारा कभी जुड़ा नही बाँध पाएगी.

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