लिखिए…. ये जो कलम में स्याही है न, उसे तेज़ाब बनाना आपका काम है

कलम उठाईये लिखने को बहुत कुछ है. पहली दफा उठे तो हो सकता है की बस माशूक के होठो की नरमाई तक ही लिख पाये, दूसरी बार उठे तो उसके दुपट्टे में उलझ के दम तोड़ दे, पर लिखिये, लिखिए क्यों की बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है.

रात के १२ बजे किसी सुनसान रेलवे स्टेशन पर शहर से दूर भागने की कोशिश में उन दो प्रेमियों की घबराहट लिखिए. उन्हें पता तो चले की इतनी दूर से भी कोई महसूस कर रहा है उन्हें. थोड़ी हिम्मत शब्दों में बाँध के दे दीजिये, ताकि ट्रेन में दस बारह लोग जब खून से तालिबान लिखने आये तो उनकी मुस्कराहट मौत को जिंदगी के तलवे चाटने पर मजबूर कर दे. लिखिए, अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है रात के ढाई बजे जब नशा टूटने पर कोई इंसान फ्रीज की तरफ ठन्डे पानी की तलाश में बढे तो अपने शब्दों में दो चार बर्फ लिखकर उसके सिराहने तरफ रख आईये। कभी कभी एक अच्छी नींद के लिए शराब से ज्यादा लोरियों की जरुरत होती है। लिखिए, घबराईये नहीं बहुत सारे लोग लिख रहे हैं आपके साथ. शराबघरों की मेजो पर गिरते हैं बहुत सारे शब्द, उन्हें उठाईये, पोंछिए चमकायिये और फिर टाँकिये. टांक दीजिये सफ़ेद कागज पे, इन्द्रधनुष लिखा जाना बाकी है. शराब और आंसू जब घुलते हैं तो बहुत सारे रंग बिखरते हैं। इन रंगो की उदासी लिखिए। इन रंगो की प्यास लिखिए. लिखिए की बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है अभी. लिखते रहिये. यूँ ही कलम उठाते रहिये।

लिखिए, ये जो हमारे आस पास शैतान है न उनके लिए एक सुपरहीरो लिख दीजिये. चौंकिए मत, सुपरहीरो लिखने के लिए आपको उड़ने जैसी, जहाज उठा लेने जैसी, हाथों से लेजर लाइट जैसी किरणें निकालने की जरूरत नहीं है. हाँ, सुपर हीरो लिखने के लिए बस कलेजे में थोड़ी सी हिम्मत और हौसलों में थोड़ी सच्चाई की जरूरत है. थोड़ी सच्चाई और हिम्मत मिलकर लिख दीजिये ने एक सुपरहीरो. लिखकर टांक दीजिये इसे शैतानों की चौखट पर. अगर दुनिया से थोड़ी से भी हैवानियत कम हो जाए तो आपका लिखना सफल है. लिखिए, इन्तजार मत करिए.

लिखिए की आपके लिखने का इन्तजार वो बुढा कई दिनों से कर रहा है जो पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों में हर रोज अपने जीवन का प्रमाण पत्र लिए सरकारी बाबुओं की जेबें गर्म करने के लिए मजबूर है. लिखिए क्यूंकि पत्थरों की चोट से घायल एक इमरान हथियार उठाने की सोच रहा है. लिखिए, क्यूंकि हजारों रावण अपने घरों से साधू के वेश में सीता के हरण के लिए निकलें हैं. लिखिए, अपने लिखे को राम बनाईये, हाँ पर राम लिखते समय कभी सीता के लिए अग्नि परीक्षा मत लिखिए. अब भी हमारी धरती इतनी संवेदनशील है की सीताओं को पुनर्वास के लिए अपना सीना चीर ले.

कागज़ पर उनके लिए चाभी लिख दीजिये। जिनके लिए बंद है दुनिया भर के हर घर। एक कलम से दो चार दीवारें और एक छत लिख दीजिये, बर्फ से ढंकी इस दुनिया में गरमाहट सभी को चाहिये. रात किसी अँधेरी सड़क पर कोई लड़की जब जमीन से किसी शैतान को उगते देखे तो अपने शब्दों से आसमान पर एक भगवान लिख दीजिये. लिखिए, लिखिए तो सही. अब भी लोगों की आँखें कलम की तरफ बड़ी उम्मीद भरी नजरो से देखती है. अब भी लोगों को उम्मीद है की कलम किसी रोते बच्चे के लिए चॉकलेट बन सकती है तो कलम इतनी क्रांतियाँ भी लिख सकती है की सोयी हुई सरकारें, सोये हुए हुकुमरान तिलमिलाकर कलम पर फतवा जारी कर दें. अरे लिखिए तो सही, ये जो कलम में नीली-काली स्याही है न, उसे तेज़ाब बनाना आपका काम है.

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