हत्या के दिन की डायरी एंट्री

डियर डायरी

मैं अगर किसी दिन किसी की हत्या कर के आऊं तो शायद मैं हत्या वाली बात तुमसे साझा न कर पाऊं। हालांकि, मेरे ख्याल से किसी व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति की हत्या कर देना जीवन की एक बड़ी घटना में से एक है और इसका दस्तावेजीकरण जितना खतरनाक है उतना जरूरी भी है। लेकिन फिर भी मैं तुम्हे यह नही बताऊंगा की मैंने किसी की हत्या कर दी है। किसकी हत्या की है? क्यों कि है? कैसे की है? हत्या के लिए मैंने कौन से हथियार का प्रयोग किया? मैं ऐसे किसी भी सवाल के बारे में लिखने से हिचकुंगा। और हिचकना लाजिमी है । मुझे ऐसी कोई जानकारी कहीं भी लिखित या मौखिक रूप से किसी से भी साझा नही करनी चाहिए जो मुझे हत्यारा साबित करे और फांसी या कारावास के नजदीक कर दे या फिर मुझे खूनी घोषित कर दे। मैं भला ऐसी बाते किसी से भी साझा क्यों करूँ।

वैसे ह्त्या करना कोई मामूली बात नहीं है। हत्या करना राह चलते किसी दूकान से सिगरेट पी लेने जैसा या फिर घंटो चलते रहने की उब को दूर करने के लिए बेवजह किसी पेड़ से पत्ता तोड़ लेने जैसा नहीं है। किसी की ह्त्या करने के लिए आदमी के पास एक ठोस वजह होनी चाहिए। जब मेरे गाँव की सबसे बूढी औरत 110 वर्ष की जिंदगी जीने के बाद मरी थी तब उसने कहा था ” सांप भी किसी को यूँ ही नहीं डसता”। अदालती भाषा में कहें तो हर ह्त्या के पीछे एक मोटिव ऑफ़ मर्डर होता है और फिलहाल मेरे पास ऐसी कोई वजह नहीं है जिसकी वजह से मैं किसी की ह्त्या कर दूं। असल जिन्दगी में चलने वाली गोली का शोर फिल्मों में चलने वाली गोली के शोर से बहुत ज्यादा तेज होता है। इतना ज्यादा की एक साथ कई लोग जिंदगी भर के लिए बहरे हो जाते हैं।

खैर अगर मैं अगर हत्या करूँ तो उस दिन डायरी मैं हत्या के बारे में रत्ती भर न लिखकर एक कविता लिख दूं। एक सुनदर सी प्रेम कविता। एक ऐसी कविता जिसमे इतना प्रेम हो की पढ़ने वाला कभी अंदाजा भी न लगा पाए कि जिसकी कविता में इतना प्रेम है वो किसी की हत्या भी कर सकता है। वो जिसके हाथों ने इतनी प्रेम से भरी कविता की रचना कि हो वो कैसे किसी और के खून से अपने हाथ रंग सकता है। हो सकता है मै कविता लिखने की जगह उस दिन की घटनाओं को बदलकर लिखूं।

मैं लिख दूं कि “आज मैं बहुत खुश था। मैंने नाश्ते मैं अपना पसंदीदा ऑमलेट टोस्ट खाया। आज मैंने एक बेहतरीन लव स्टोरी देखी। फ़िल्म देखने के बाद मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को घर बुलाया। उसके साथ मैंने वही फ़िल्म दोबारा देखी। उसके लिए भी अपना पसंदीदा नाश्ता बनाया। फ़िल्म देखने के दौरान मैंने उसके बालों की चम्पी भी की। फ़िल्म के एक बहुत ही ज्यादा अतरंग दृश्य को देखने के बाद फ़िल्म को पौज कर गर्लफ्रेंड के साथ सेक्स भी किया। कूल मिलाकर मैं उस दिन के बारे में ये बताऊंगा की मैं उस दिन बहुत खुश था। एक आदमी अपना पसंदीदा खाना खाने के बाद, अपनी गर्लफ्रेंड के साथ अपनी पसंदीदा रोमांटिक फिल्म देखने के बाद, अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ऑर्गेजमिक सेक्स करने के बाद भला खून क्यों करेगा। इतनी खुशी के बाद भला कोई किसी का खून कर सकता है क्या?

हालांकि घटनाओं को इस तरह बदलकर लिखने से कोई तेज तर्रार जासूस या पुलिसवाला डायरी पढ़ने के बाद ये मान के नही बैठेगा की मैंने हत्या नही की होगी। एकबारगी वो अगर इन घटनाओं पर विश्वास कर भी ले तब भी यह साबित नही होता कि मैंने हत्या नही की है। आदमी की खुशी कब दुख या क्रोध में बदल सकती है पता नही चलता। डायरी पढ़ने वाला ये भी तो सोच सकता है कि मेरे द्वारा बनाया गया नाश्ता मेरी गर्लफ्रेंड को पसंद न आया हो और उसने प्यार से बनाये गए इस नाश्ते को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ नाश्ता घोसित करने बजाय यह कह दिया हो कि “इसमें नमक कम है, और अंडा ठीक से पका नही है। तुम्हे पता है न कच्चे अंडे से मुझे उबकाई आती है। हटो मुझे उल्टी आ रही है” और मुझे उसकी ये बात बुरी लग गयी हो और मैं दुखी या क्रोधित हो गया होऊं। या फिर ये भी हो सकता है की मैं उसके उल्टी करने के बात पर क्रोधित हो गया होउँ और मैने उस से बहस की हो कि अंडा इतना कच्चा नही था कि किसी को उल्टी आ जाये। या फिर ये भी हो सकता है कि उसकी उल्टी देख के मुझे लगा होगा कि वो प्रेग्नेंट है और मैने उसे प्यार भी किया हो। लेकिन फिर ये भी हो सकता है कि उसके शादी करने की बात से मैं अंदर ही अंदर परेशान हो गया हूँ। मैंने उसे समझाया हो कि अभी मैं शादी नही कर सकता। मेरे पास न नौकरी है न धेले भर का पैसा है। सड़कछाप मैगजीन में मचलती कहानियां लिखकर इतना पैसा नहीं जमा कर सकता कि शादी के आठ महीने बाद ही पिता बनना अफॉर्ड कर पाऊं। इसलिए हो सकता है मैंने अबॉर्शन की बात की हो और तुमने मुझे निष्ठुर हत्यारा जैसी गालियां दी हो। मैं गालियां सुनता हूँ। मुझे फर्क नही पड़ता है पर लेकिन शायद उस वक़्त मैं हत्यारा जैसी चटख लाल रंग की गाली बर्दाश्त नही कर पाया होऊं और मैंने उसे धक्का दे दिया हो और वो गिर गयी हो। यूँ मेरे धक्का देने से इंसान जल्दी गिरता नही है पर शायद वो गिर गयी हो क्योंकि उसके पैर गीले थे। गिरने से आदमी का सर नही फटता पर उसका फट गया हो और सर से खून बहने लगा हो। खून बहने से आदमी मरता नही पर शायद वो मर गयी हो।

इंसान को अपने पैर या अपनी आँखें गीली  नही रखने चाहिए, मरने की संभावना बढ़ जाती है। इंसान को प्यार भी नही करना चाहिए उसमे भी मरने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। प्यार करने से आदमी को खून की कमी हो सकती है लेकिन आदमी प्यार किये जाने के बाद की जो प्यार की कमी होती है उस से मारा जा सकता है। इंसान को बेरोजगार आदमी से भी  प्यार नहीं करना चाहिये। आदमी खाली जेब के कुवें में गिरकर भी मारा जा सकता है। आदमी हथियार से नही मरता। आदमी मारे जाने की संभावनाओं से ज्यादा मरता है। ‘संभावना’ से याद आया उसका नाम भी संभावना ही है। ही है?? या ही था।

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Photograph: Helmut Newton

मैं तीन दिनों से घर से बाहर नही निकला क्योंकि मैंने किसी की हत्या नही की। हत्या करने वाले लोग घर से बाहर होते है। घर के भीतर किसी लाश के पास बैठकर डायरी थोड़े ही लिखा करते है। घर में बस एक कप चाय के लिए दूध है। मुझे अब शायद दूध लाने के लिए घर से बाहर निकलना चाहिए। पर मेरे पास पैसे नहीं है। मेरे गाँव की वो बुढिया जिसने मरते समय सांप वाली बात कही थी वो जब ज़िंदा थी तब उसने एक बार कहा था की आदमी खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही चला जाता है। आदमी अपना कमाया धमाया सबकुछ यहीं छोड़ के चला जाता है। मेरी गर्लफ्रेंड तो जा चुकी है पर उसके पर्स में अब भी शायद इतने पैसे जरुर होंगे जिससे मैं इतना दूध तो खरीद ही सकता हूँ की दो कप चाय मिल जाए। मुझे अब जाना चाहिए।

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7 thoughts on “हत्या के दिन की डायरी एंट्री

  1. बहुत बढ़िया चित्रण….. लगता है.. जैसे वास्तविक घटना के बारे में पढ़ रहे हों… एकदम सजीव….

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