दुख का कुवां

दुख का कुवां

उसके घर के बाहर एक दुःख का कुवां था। उसकी मां जब खाना पका लेती, उसके पिता जब अखबार पढ़ लेते और उसकी बुआ जब मोहल्ले के दस घरों में घर की कहानी बता कर घर लौट आती तब तीनो मिलकर दुख के कुवें के मुंडेर पर बैठते। उसकी मां अक्सर कुवें पर बैठकर देर तक रोती। उसके पिता जल्दबाजी में कुवें से पानी निकालकर अपने देह पर उड़ेलते। 10 20 बाल्टी कुवें से निकालने के बाद, पानी और पसीने से भीग जाने के बाद वो जोर से चिल्लाते। उसकी बुआ मुंडेर पर पड़े पानी के बूंदों से आंखे गीली करती और अंदर की कुटिल खुशी को रोनी सूरत का नकाब पहनाकर अपने अभिनय पर अघाती थी।

वो अपने छत के कमरे से इन तीनो को देखता और दीवार पर नंगे हाथ मुक्के बरसाता। उसके मुक्के दीवार पर इतनी जोर से पड़ते की दीवार कांप जाती। उसके हाथ से जिस तेजी से खून बहता उसके मुक्के भी उतनी तेजी से दीवार पर पड़ते। जब उसके हाथ दर्द के सामने घुटने टेक दिए तब उसने पूरी ताकत के साथ दीवाल पर एक आखिरी मुक्का मारा और बहुत जोर से चिल्लाया। दीवार पर मुक्के के प्रहार से दीवार बहुत जोर से काँपी और दीवार पे टँगी एक तस्वीर फर्श पर गिर गयी। उसके चींखने के शोर से उसकी माँ कुवें के मुंडेर पर और तेज रोने लगी। उसके पिता और तेजी से देह पर पानी उड़ेलने लगे और उसकी बुआ हंसते हुए रोने की कला में और पारंगत होने लगी।

दीवार से गिरी तस्वीर में जो चेहरा था वो उसकी बहन से बहुत मिलता जुलता था। अपनी बहन के बारे में वो सब कुछ भूल गया था। उसे बस एक ही बात याद थी कि उसकी बहन तीन दिन पहले घर के बाहर वाले कुवें में कूद के मर गयी थी। उसे कूद के मरते हुए बस उसकी मां ने देखा था पर उस रात पूरे शहर को एक सपना आया था कि उसकी बहन कुवें में कूद के मर रही है और उसके साथ एक बच्चा भी है। शहरवालों ने एक टीवी चैनल को बताया कि उन्होंने सपने में जो बच्चा देखा उसकी कोई शक्ल नही थी। वो बच्चा शायद अभी जन्मा नही हुआ होगा।

वो तीन रातो से सोया नही था। वो चाहता था की वो जितनी जल्दी हो सके इस दुख के कुवें में कोई बड़ा सा पत्थर डाल के कुवें को भर दे और कुवें वाली जगह पर बरगद का एक पेड़ लगा दे। पर तीन रातो से कुवें की मुंडेर पर बैठी अपनी बहन को वो बार बार कुवें में डूबता देख रहा था। उसकी बहन जब भी कुवें में कूदती एक बच्चा थोड़े देर के लिए रोने लगता। वो तीन रातो से बस इस बात का इंतजार कर रहा था कि उसकी बहन बस एक बार उसको देखे। चौथी रात वो जब कुवें की मुंडेर पर आया तब उसकी बहन ने उसको देखा और दौड़कर बगल के एक घर मे घुस गई।

अगली सुबह जब उसकी मां उसके पिता और उसकी बुवा जब कुवें के मुंडेर पर आए तो कुवें में दो लाशें मिली। एक लाश उस लड़के की थी दूसरी लाश भी किसी लड़के की ही थी पर उसका चेहरा पहचान में नही आ रहा था। उसके चेहरा एकदम टूटा सा था जैसे एक ही बार में दुनिया के कई भाइयों ने उसके मुँह पर जोरदार मुक्के मार दिए हो।

लाश देखने के बाद उसकी माँ दुख के कुवें पर बैठकर जोर से चिल्लाने लगी। उसके पिता देह पर जोर जोर से पानी उड़ेलने लगे मानो वो पानी मे गल के पानी बन जाना चाहते हो। उसकी बुवा अपनी हंसी को छिपाकर फिर से रोटी रही। बगल के घर से एक औरत आयी और दूसरी लाश को देखकर कुवें की मुंडेर पर चिल्लाकर रोने लगी।

उस रात शहरवालो ने सपना देखा कि उसकी बहन के साथ जो बच्चा था वो उसी कुवें में बड़ा हो चुका है लेकिन अब भी उसकी शक्ल नही है। उसकी शक्ल की जगह मांस का एक टुकड़ा है जिसमे कई मुक्कों के निशान है।

अराहान

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