तितली

दरवाजे को जोर से पीटते हुए दिवाकर घर से बाहर निकल गया. अन्दर घर के एक कमरें में स्नेहलता बिस्तर पर यु ही पड़ी रही. जब दिवाकर गुस्से से घर से बाहर निकल रहा था तब उसने उसे रोकने की कोशिश नहीं की. उसने दिवाकर को रोकने के लिए उसका नाम लेना चाहा था लेकिन शायद उसके नाम का शब्द उसके गले में किसी बड़े पत्थर अटक गया था. वो शांत सी बिस्तर पर ही पड़ी रही. उसकी शान्ति शहर के सुनसान इलाके में खड़े एक मकान की तरह थी जिसके अन्दर बड़ी शांति सी किसी के मुह पर कपड़ा रखकर गला रेता जा रहा हो.

पहले कमरे के इसी बिस्तर पर खिड़की से चाँद निहारते दुनिया भर की सारी जरुरी, गैर जरुरी बाते करते. इसी बिस्तर पर एक बार बातो बात में दिवाकर ने उस से पूछा था

“चलो आज अपने बचपन की कोई बात बताओ”
“बचपन की बात! अपने बचपन की तो मैंने लगभग साड़ी बात बता दी है की कैसे एक बार मेले में मैं पापा से बिछड़ गयी थी और जोर जोर से रोने लगी थी, कैसे एक बार चिंटू ने मुझे बचपन में गलती से गड्ढे में धकेल दिया था तो पापा ने उसे कितना पीटा था.”
“कोई और बात, जो तुमने मुझे न बताई हो”
“तुम्हे पता है मैं न बचपन में न तितिली बनना चाहती थी. एक बार मै अपने दोनों हाथों में माँ के दुपट्टे को बाँध बनाकर उड़ने की कोशिश कर रही थी और गिर गयी थी. मुझे तितलियों का उड़ना, उनका रंगो से भरा होना आज भी पसंद है”
“खैर तुम अपने बचपन की कोई बात बताओ”
“मेरे बचपन की बात, मैं बचपन में बहुत शैतान था, मैं तितलियों को पकड़ कर शीशे के एक जार में कैद कर देता था”

स्नेहलता इस बिस्तर पर दिवाकर से हुई उस दिन की बात को याद करके पहले थोड़ा सहमने की कोशिश करती है. फिर बिस्तर से उठकर बाजू में रखे मेज की ड्रावर से एक फोटो एल्बम निकालती है. उसकी आँखों से एक बूँद एल्बम की उस फोटो पर गिरती है जिस फोटो में वो दोनों मुस्कुराते हुए समंदर के लहरों के बीच खड़े होते हैं. उसकी आँख से गिरा आंसू का कतरा भी उसी समंदर के बीच गायब हो जाता है.

धडाम की आवाज से दरवाजा खोलते हुए दिवाकर घर में घुसता है. “स्नेहा, स्नेहा ” दिवाकर की आवाज घर के ड्राइंग रूम में गूंजती है. कोई जवाब न पाकर दिवाकर कमरे में घुसता है.

“कमरे में बेड की जगह एक बड़ा सा जार होता है, जिसमें एक बड़ी सी तितली पंख फडफडाती हुई घूम रही होती”

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