गुमशुदा

हम कब कहां गुमशुदा हो जाएं ये हमे पता नही होता। गुमशुदा होना बस इतना ही नही है कि एक घबराए माता पिता आनन फानन में एक रिक्शे पर दूरी की कीमत तय किये बिना पुलिस स्टेशन जाए और आपकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करें। गुमशुदा होने का मतलब ये नही है कि एक अनजान शख्श नौकरी की तलाश में एक बड़े शहर आये और वहाँ किसी दीवार पर आपकी गुमशुदगी का इश्तेहार देखे या फिर कोई बूढा सुबह सुबह चाय पीते पीते अखबार में आपकी गुमशुदगी की खबर पढ़े और अपने बेटे को कहे कि वो शाम को जल्दी घर लौटे। गुमशुदा होना ये भी हो सकता है कि आप दफ्तर में कोई जरूरी फ़ाइल पढ़ रहे हों और आपको अचानक से आपकी पहली प्रेमिका का ख्याल आ जाए। आप सड़क पर चल रहे हो और बादलो में खरगोश हाथी या ऊदबिलाव देख रहे हो। गुमशुदा होना ये भी हो सकता है कि आप हर शाम सही वक्त पर घर आये, अपने कमरे में घुसे, बेड पर एक नई बेडसीट बिछाएं पर बिस्तर पर लेटने से पहले बहुत जोर से चिल्लाए और फिर थोड़ी देर आईना देख कर सो जाएं। गुमशुदा होने की घटना को हम आप चार पांच परिभाषाओं में नही गूंथ सकते, कहीं दूर चले जाने की हर नाकाम कोशिश गुमशुदा होने की एक नई परिभाषा तय करती है।

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