शालिनी

मैं पिछले अठारह साल से कहाँ था इसकी कहानी इस अठारह साल की लड़की से शुरू होती है जो अभी मेरे सामने एक बिस्तर पर एक 20 साल के लड़के के साथ बेसुध सोयी है. मुझे नहीं पता की प्रेम देह पर जाकर खत्म होता है या फिर देहों के सड़ जाने पर होता है. पर मुझे अपने अनुभव से इतना जरुर पता है की मुझे पहली बार इस से तब प्यार हुआ था जब इसने मेरी पहली किताब पर औटोग्राफ लेते हुए मुझसे कहा था “ये बहुत ही घटिया उपन्यास है” मुझे इसके जवाब पर मन ही मन थोड़ी कोफ़्त तो हुई थी पर मैंने मुस्कुराते हुए उस से पूछा “अगर किताब इतनी ही घटिया है तो ऑटोग्राफ लेने के पीछे की वजह” मेरे इस बात पर उसने चेहरे पर बिना कोई भाव लाते हुए कहा “किताब घटिया है पर लिखने वाला मुझे पसंद है”. उस दिन पता नहीं क्यों मुझे उसकी बेबाकी पर उसकी चश्मे के पीछे टिमटिमाती बड़ी-बड़ी आँखों पर या यूँ कहें उसके काले जूड़े में बंधे बालो से प्यार हो गया. किसी से प्यार होने के लिए ये दो वजहें बहुत ज्यादा हैं. इतनी ज्यादा की किसी को किसी से एक ही बार में बार-बार प्यार हो जाए. मुझे उस दिन उस लड़की से प्यार हो गया था और उस दिन मैंने उस लड़की को ऑटोग्राफ के साथ-साथ अपना दिल और अपना नंबर भी दे दिया था.

उस दिन घर आकर मैंनें कई बार अपने उपन्यास को पढ़ा. उस दिन मुझे लगा की सच में वो लड़की सच कह रही है. मैंने वाकई एक घटिया उपन्यास लिखी है. मुझे उस दिन अपने उपन्यास के लिखे हर शब्द घटिया लगे. मैं सुबह से शाम तक बस इसी बात का इन्तजार करता रहा की उसका फोन कब आएगा. इश्क में डूबे लोगों को इस बात का बहुत अच्छे से अंदाजा होगा की इंतजार की घड़ियाँ कितनी लम्बी होती है. मुझे भी उस दिन अंदाजा हुआ की आखिर सच में इतंजार करना एक लम्बी सदी को, रेत घड़ी निहारते-निहारते गुजार देना होता है. उस दिन मैंने उसके फोन का रात 12 बजे तक इन्तजार किया था फिर पता नही कब सो गया. मेरी नींद रात के ठीक 3 बजे एक गुमनाम नंबर से आये फोन की वजह से टूटी. मैंने फोन उठाया. उधर से एक बहुत खूबसूरत आवाज आई. “हेल्लो, क्या मेरी बात शुभम शर्मा से हो रही है” इतनी खूबसूरत आवाज मैंने बस कस्टमर केयर वाली लड़कियों की सुनी थी या फिर रेलवे स्टेशन पर अनाउंसमेंट करने वाली लड़कियों की. मैंने दबी आवाज में उससे कहा

“जी, आप कौन”
“अरे वाह! आज ही मिले आज ही भूल गये”
मुझे इतने देर में यह बात समझ आ गयी थी की ये उसी का फोन था. मैंने अपने अन्दर की ख़ुशी को अपने दांतों से भींचते हुए कहा “अरे आप! आपको कैसे भूल सकता हूँ. मुझे पता था की आपका फोन जरुर आएगा. वैसे अभी तक मुझे आपका नाम भी नहीं पता”
“शालिनी”
“शालिनी…. क्या”
“बस शालिनी”
“अच्छा शालिनी कहिये आपने कैसे याद किया”
“दरअसल, मैं चाहती थी की आप मेरी एक कहानी को अपने नए उपन्यास का विषय बनायें. ये काफी जरुरी है मेरे लिए और इसके लिए मैं चाहती हूँ की आप अभी मेरे पास आये मैं यहीं रेवती नगर में रहती हूँ. मैं आपको अपना पता भेजती हूँ. आप बस आ जाइए.”

उसने इतना कुछ इतना जल्दी कह दिया की मुझे कुछ समझ नहीं आया. इतनी रात को एक अनजान लड़की किसी को घर पर बुलाये ये बहुत ही अजीब है. मैंने कुछ देर सोचा और अपने अन्दर के सारे नकारात्मक विचारों को दूर कर के उससे मिलने के शहद से लिपटे आग्रह को सहर्ष स्वीकार कर लिया.

“अच्छा ठीक है. आप पता भेजिए मैं आता हूँ”


उस दिन मैं वहां नहीं होता तो शायद आज मेरे जिंदगी के 18 साल यूँ ही गायब नहीं होते. उस दिन जब मैं उसके घर पहुंचा तो उसने मुझे बहुत प्यार से बात की. उस दिन से पहले मैंने कभी किसी लड़की साथ अकेले रात के इतने पहर को शराब नहीं पी थी. उस दिन मैं ढेर सारी शराब पी ली थी. इतनी शराब पीने के बीच मेरी उस से ढेर सारी बातें भी हुई. उसकी पसंद नापसंद, कौन से लेखक उसे अच्छे लगते हैं मेरी किताब उसे क्यों पसंद नही आई, मैं उसे पसंद हूँ या नहीं.. वगैरह-वगैरह. मैं उस से बस ये न पूछ पाया की वो है कौन. रात में एक 18 साल की खूबसूरत लड़की जिसने कहा हो की आप उसे पसंद करते हैं. जिसे आप भी पसंद करने लगे हो. आपने शराब पी हो. आपने उसका हाथ थमा हो और आप उसके बहुत करीब हो. ऐसे में ये कौन पूछता है कि तुम कौन हो.

उस दिन बातों बातों में हम कब एक चादर के नीचे आ गए पता नही चला. उसका सर मेरे काँधे पर था और हम दोनों बालकनी में बैठे चाँद और तारों को निहार रहे थे. काली रात में टिमटिमाते तारे उसके जूड़े से बंधे बालों की तरह लग रहें थे. मैंने उसके जूड़े पर हाथ रखते उसे खोलने की कोशिश की पर न जाने क्यों वो किसी हिरणी की तरह चौंकते हुए सतर्क हो गयी और मेरे हाथ को अपने जूड़े से दूर कर दिया.

“क्या हुआ, मैं बस तुम्हारे बालों को छूना चाहता था”
“कुछ नही”

इतना कहने के बाद उसने मुझे कुछ और बोलने का मौक़ा नही दिया. मेरे होठ शहद जैसे स्वाद वाले शराब में डूब चुके थे. मैं उस शहद के नशे में ऐसा खोया की पता नही कब नींद के आगोश में चला गया.

उस दिन जब मेरी आँखें खुली तो मैने खुद को किसी चीज में लिपटा पाया. मेरी आँखों के सामने घना अन्धेरा था. ऐसा लग रहा था जैसे कुछ महीन रेशम के धागों ने मुझे जकड रखा हो. मैं बहुत जोर से चिल्लाया. “शालिनीईई….”
तभी मेरे बगल से किसी आदमी की आवाज आई. “आज एक और फंस गया”
“कौन हो तुम, मैं कहाँ हूँ”
उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा की मैं भी तुम्हारी तरह ही हूँ, एक आशिक. और मेरी-तुम्हारी तरह यहाँ कई लोग हैं”
मुझे धीरे-धीरे वहां और लोगों की आवाजें सुनाई दी.
“हम हैं कहाँ”
“शालिनी के जूड़े में”


आज अठारह साल के बाद मेरे सामने लेटी इस लड़की के बगल में सोये लड़के ने इस लडकी के जूड़े खोल दिए हैं. शायद शालिनी सो गयी होगी या फिर उसे इस लड़के से प्यार हो गया होगा जो उसने इसके जूड़े को खोला होगा. मैं अभी 40 साल का हूँ मेरे साथ और भी लोग जो मेरे ही उम्र के आस पास के उम्र के होंगे. ये मेरे साथ खड़ें हैं. आज हम शालिनी को उसके प्यार का तोहफा देंगे. अब शालिनी दुबारा कभी जुड़ा नही बाँध पाएगी.

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