पेन्सिल

लम्बी कहानी/पेन्सिल
 
उस दिन ऑफिस में पहला दिन था. महीनों बेरोजगार रहने के बाद मुझे एक बुक पब्लिशिंग कंपनी में एडिटर की जॉब मिली थी मैं बहुत खुश था. मेरी तनख्वाह काफी अच्छी थी. और जिस शहर में मेरी नौकरी लगी थी वो शहर इतना छोटा और सस्ता था की महीने में मैं कितना भी खर्च करूँ मेरे पैसे बचने वाले ही थे. सबकुछ अच्छा था बस ये दफ्तर बहुत पुराना था. अब भी यहाँ किताबों को एडिट करने के लिए कंप्यूटर नहीं थे. पेंसिल से ही किताबों की प्रूफरीडिंग और एडिटिंग होती थी. ऑफिस में जितने लोग थे वो सब बूढ़े थे. मेरे सिवा किसी की भी उम्र 60 से कम नही थी.
 
ऑफिस के पहले दिन जहाँ बाकी दफ्तरों में इंडक्शन जैसी औपचारिकता होती हैं यहाँ वैसा कुछ नहीं था. पहले दिन मेरे टेबल पर एक बूढ़े आदमी ने 4 किताबे, कुछ पेंसिल एक इरेज़र और एक शार्पनर रखते हुए कहा
“कोई भी दिक्कत हो आप शर्मा सर से कहेंगे. वो आपके बॉस है.”
“जी ठीक है” मैंने अनमने ढंग से जवाब दिया” और किताबें देखने लगा.
मैं जिस कमरे में बैठा था वहां मेरे बॉस के अलावा 3 और लोग थे जो देर से आये थे. उनके आने बाद शर्मा सर ने मुझे उन सब से परिचय करवाया. रेखा झा. जनक प्रसाद और विपिन शर्मा.
 
रेखा झा और जनक प्रसाद में कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी. लेकिन विपिन शरमा का नाम और उसकी शक्ल देखकर मैं चौंक गया. उसका चेहरा हूँ ब हूँ मेरे एक बचपन के दोस्त के साथ मिलता था. अगर मेरा वो बचपन का दोस्त 60 साल का होता तो ठीक वैसा ही दिखता. सांवली सी सुरत. सफ़ेद स्लेटी बाल. थोड़ा झुका हुआ शरीर. चेहरे पर झुर्रियो की महीन रेखाएं. मुझे उस से मिलकर थोड़ा अजीब लगा क्यूंकि उसने बहुत ही अनमने ढंग से हाथ मिलाया और चेहरे पर बिना किसी तरह का भाव लाये अपने कुर्सी पर बैठ गया. उस दिन दफ्तर में न मैंने किसी से बात की न ही किसी और ने. मैं उस दिन साढ़े 5 बजते ही ऑफिस से निकल गया.
 
मेरे दफ्तर से घर तक का रास्ता तकरीबन एक घंटे का है. मैं उस दिन रास्ते भर अपने बचपन के दोस्त विपिन के बारे में सोचता रहता. मैं जितना उसके बारे में न सोचने की कोशिश करता दिमाग में उस से जुड़े दृश्य उतने ही तेजी से फिल्म की तरह चलने लगते. एक ऐसी फिल्म के दृश्य जिसमें मैं एक विलेन था.
 
वो दृश्य जो मेरी आँखों के सामने तैर रहा था उस से मैंने हमेशा भागने की कोशिश की है. उस दृश्य को अपने आँखों के कैनवास से हटाने के लिए मैंने न आने शहर बदले थे, न जाने कितने यत्न किये थे लेकिन हर बार जब भी मैं शांत होता वो दृश्य मेरे आँखों से इस तरह चिपक जाते जैसे बरसो बाद मिलने पर दो प्रेमी एक दुसरे से लिपट जाते हैं. उस दृश्य में तीसरी कक्षा में पढने वाले दो ऐसे लड़के थे जिन्हें क्लास रूम के बाहर वाले कॉरिडोर के फर्श पर स्लाइड करना पसंद था. वो उन दोनों का फेवरेट गेम था. कॉरिडोर के एक कोने से दुसरे कोने ट स्लाइड मारना. जो ज्यादा दूर स्लाइड करता वो जीत जाता था. मैं और विपिन रोजाना ऐसा करते थे. हर बार मैं ही हारा करता था. मैं बचपन से ही हर काम में औसत था. पढाई में, खेल में, कला में. मैं इतना बड़ा फैल्युर आदमी था की चापा कल से पानी निकालने आली प्रतियोगिता में भी हार जाता था. यहाँ तक लूडो के भी खेल में मैं हमेशा हारता था. मेरे अन्दर बचपन से ही एक लूजर ने जन्म ले लिया था, जिसे केवल हारना आता था.
 
शुरुआत के दिनों में मैं हारने को एक सीख समझ कर, आगे जीतने की प्रेरणा समझकर मान लेता था लेकिन बाद के दिनों में मुझे हारना बेहद अपमानित कर देता. धीरे-धीरे मैं उस छोटी उम्र में ही दिल से बुरा आदमी बन्ने लगा था. मैंने बचपन से ही हर उस आदमी को जान से मार देने की ठान ली थी जो मुझे आगे था, जो मुझे हरा देता था. हालाँकि, एक तीसरी क्लास के बच्चे के लिए किसी को जान से मार देना ज्यादा आसान नही था लेकिन किसी को घायल कर देना बहुत हद तक मुमकिन था.
 
मेरे जिंदगी के सबसे खतरनाक दृश्य में उस दिन उन दो लड़कों के स्लाइडिंग प्रतियोगिता के खत्म हो जाने के बाद एक बहुत ही लोमहर्षक घटना घटी थी. उस दिन उन दो लड़कों में से एक लड़के ने अपने साथ के दुसरे लड़के के गर्दन में एक ताजा-ताजा शार्प की गयी पेन्सिल घुसेड दी थी. दुसरे लड़के के गर्दन से खून बह रहा था और हमला करने वाले लड़के की आँखों में खतरनाक हंसी चमक रही थी. बाद में हमलावर लड़के को पुलिस के हवाले भी कर दिया गया था लेकिन एक पुलिस बाप ने अपने बेटे को बाल सुधर गृह जाने से बचा लिया था. उस दिन की अच्छी बात ये थी की हमला करने वाला लड़का जेल नही गया, घायल होने वाला मरा नही. उस दिन की घटना के बाद बस इतना हुआ की वो दोनों लड़के दुबारा उस स्कूल नही गए. उस शहर की जमीन से वो दोनों लड़के अचानक से ऐसे गायब हो गए जैसे वो उस शहर में कभी रहे ही नही थे.
 
आज विपिन शर्मा से मिलने के बाद अचानक से वो सारे दृश्य मेरी आँखों में ज़िंदा हो गए थे. मुझे बार बार लग रहा था की ये बुढा मेरे बचपन का वही दोस्त है. हालांकि ऐसा होना बेहद नामुमकिन था. मैं अगले दिन जब ऑफिस गया तब सबकुछ वैसा ही था जैसे कल था. मैं अपने डेस्क पर बैठा एक किताब एडिट कर रहा था. बाकी लोगो की तरह विपिन भी अपने सक पर बैठ के अपना काम कर रहा था. वो दिन बेहद सामान्य सा था लेकिन न जाने मुझे ऐसा लग रहा था की आज कुछ बेहद अजीब होने वाला है.
 
उस दिन जब मैं लंच के बाद अपने डेस्क पर बैठने जा रहा था तभी विपिन शर्मा ने मुझे स्टेशनरी रूम में साथ चलने का इशारा किया. मुझे उस दिन लगा शायद शायद उसे मुझसे कोई काम हो इसलिए मैं उसके कहने पर उसके साथ स्टोर रूम चला गया.
 
“मुझे एक पेन्सिल चाहिए थी. यहाँ पर पड़ी सभी पेंसिलें खत्म हो चुकी हैं” वो कमरे की एक कुर्सी पर बैठते हुए बोला
“आप मुझे मेरे डेस्क पे ही बोल देते मैं वहीँ आपको पेन्सिल दे देता. मेरे पास कई पेंसिलें हैं.” मैंने अपनी खीज को दबाते हुए बड़े ही विनम्र शब्दों में कहा
“तुम्हें पता है इस दुनिया की सारी पेंसिलें खो चुकी हैं”
“आप ये कह रहे हैं. अगर सब पेंसिलें खत्म ही हो गयी हैं तो मैं आपको कहाँ से पेन्सिल दे दूं. आप मतलब ठीक तो है न. 60 वर्ष में आदमी सठियाना शुरू करता है, एकाएक पागल नही हो जाता” मैंने थोड़े कड़ी आवाज में उसे कहा और वहां से जाने के लिए कुर्सी से उठा.
वो कुछ सेकंड बैठा रहा और फिर अचानक से मेरा हाथ अपनी गर्दन की अरफ ले जाते हुए बोला “यहाँ हैं एक पेन्सिल. कई सालों से पड़ी है. बहुत दर्द देती है ये पेन्सिल. अगर तुम चाहो तो मुझे इस दर्द से आजाद कर सकते हो. मैं उस दिन उन पेंसिलों के जख्म की वजह से असमय ही बुढा हो गया. मेरे हाथ पैर कांपते हैं. मेरी यादाश्त ठीक नहीं रहती. मैं हमेसा एक गहरे दर्द में जीता हूँ. निकाल दो ये पेन्सिल”
उस दिन उसकी वो बात सुनकर मैं कुछ देर के लिए पत्थर का हो गया. अचानक से मेरे आस पास की चीजें ठंडी और काली होती नजर आने लगी. मुझे अचानक से एक बच्चे की रोने की तेज आवाज आने लगी. उस असहनीय स्थिति में अचानक से मैंने उसके गर्दन से वो पेन्सिल निकाल दी. सबकुछ अचानक से पहले की तरह हो गया. आदमी के काँधे से अगर कोई दोष हैट जाए तो शरीर बहुत हल्का महसूस करता है. उस दिन मुझे सालों बाद हल्का-हल्का महसूस हुआ. मैं इतना अलका महसूस कर रहा था की मेरी आँखें एक नम हो चुकी थी.
 
मैं उस दिन स्टेशनरी रूम से सीधा वाशरूम की तरफ गया. मैंने पानी की कुछ छीटें अपनी आँखों पर मारी और आईने को देखर पहले मुस्कुराया, हंसा और चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगा.
 
उस दिन मेरी उम्र अचानक से 60 साल हो गयी और मेरे मैंने अपने गर्दन के अन्दर एक पेन्सिल को धंसा पाया.
 
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s